सुन मेरे हमसफर 46

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     सारांश के इस ऐलान से समर्थ बुरी तरह घबरा गया क्योंकि इस वक्त तन्वी भी वहीं मौजूद थी। उसने बिल्कुल नहीं सोचा था कि उसके चाचू इस मौके का फायदा उठाएंगे। तन्वी की तरफ नजर उठाकर देखने की उसकी हिम्मत नहीं थी तो उसने बेबसी और नाराजगी में सारांश की तरफ देखा। सारांश की आंखों में जो था उससे ये साफ जाहिर था कि उसने जो किया तो बिल्कुल सही किया और इस बात के लिए वो कोई एक्सप्लेनेशन नहीं देने वाला।


      अव्यांश अपने सोमू भाई की शादी की बात सुनकर खुशी से उछल पड़ा और उसने खुशी में एक बार फिर समर्थ को गोद में उठा लिया "वाॅ भाई! मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि बेंगलुरु से वापस आते ही मुझे इतनी बड़ी गुड न्यूज़ सुनने को मिलेगी! फाइनली आपने शादी के लिए हां कर ही दिया।"


      सिद्धार्थ उसे बताना चाहते थे कि समर्थ ने अभी तक इस रिश्ते के लिए हां नहीं कही है। लेकिन सारांश ने कहा "अरे बिल्कुल! अब लड़की है ही इतनी स्मार्ट और इंटेलिजेंट कि उसके जैसी दूसरी ढूंढने से भी नहीं मिलेगी। बिल्कुल वैसी, जैसी हमारे सोमू को पसंद है। इनकार करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।"


    अव्यांश ने समर्थ को नीचे उतारा और हैरान होकर कहा "भाई को कैसी लड़की पसंद है? अब तक तो ये लड़कियों से दूर भागते थे, फिर आपको कैसे पता कि भाई को किस टाइप की लड़की पसंद है?"


      सारांश वाकई कुछ ज्यादा ही बोल गया था। वह तो बस तन्वी के सामने यह सारी बातें क्लियर करना चाहता था ताकि तन्वी समर्थ को भूल कर अपनी लाइफ में आगे बढ़ सके। अव्यांश था तो आखिर उसी का बेटा, जो छोटी-छोटी पॉइंट को पकड़ लेता था। अव्यांश ने एक बार फिर पूछा "डैड! आपको कैसे पता कि भाई की पसंद कैसी है? भाई को तो लड़कियां मुसीबत नजर आती थी!"


     सारांश को थोड़ा हिचकिचाते देख सिद्धार्थ ने बात संभाली और कहा "हमारे और तुम्हारे में एक जनरेशन का गैप। तुम लोगों का ध्यान मोबाइल लैपटॉप से हटता नहीं और अपनी अलग ही दुनिया में खोए रहते हो। हम चारों तरफ नजर रखते हैं, काम पर भी और अपनों की हरकतों पर भी। अरे यह बाल ऐसे ही धूप में सफेद नहीं हुए।"


      सिद्धार्थ की घिसी पिटी डायलॉग सुन अव्यांश हंस पड़ा और कहा "क्या बड़े पापा, आप भी! कहां से आपके बालों में सफेदी नजर आ रही है! बड़ी मां तो डाई लगा लगा कर आपके बालों को काले रखे हुए है।"


      अपनी उम्र बारे में सुनकर सिद्धार्थ नाराज हो गया और कहा "मेरे बाल नेचुरल काले हैं। तेरी बड़ी मां डाई लगाती होगी और तेरा बाप करता होगा। मैं नहीं करता ये सब।"


    बात उन सब के फैमिली डिस्कशन तक चली गई थी और उन सबके बीच तन्वी चुपचाप सर झुकाए वहां खड़ी थी। उसने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और कहा "मैं आप सबके लिए कॉफी लेकर आती हूं।"


       अव्यांश का ध्यान तन्वी की तरफ गया तो उसने कहा "मैं तो भूल ही गया तुम्हें! तुमने बताया नहीं, तुमने यहां ज्वाइन कब किया? मुझे तो इस बारे में किसने बताया ही नहीं।"


    तन्वी ने जबरदस्ती मुस्कुरा कर कहा "अभी 4 महीने पहले, जब आप यहां नहीं थे।"


    तन्वी को इस तरह फॉर्मेलिटी करते देख अव्यांश ने उसे कंधे पर हाथ रखा और नाराज होकर कहा, "क्या यार! तुम्हारे मुंह से ये आप अच्छा नहीं लगता। सोनू की दोस्त होकर मुझे इतना रिस्पेक्ट दोगी तो मुझे पचेगा नहीं और मेरा पेट खराब हो जाएगा।"


     तन्वी इस बार वाकई में थोड़ा सा मुस्कुराई। सिद्धार्थ ने कहा "तुम लोग जो करना है करो, मैं अपने केबिन में जा रहा हूं।" फिर समर्थ से पूछा "तुम्हें यहां रुककर कॉफी पीना है या अपने केबिन में जाना है?"


    समर्थ नजर झुकाए हुए बोला "नहीं! मैं अपने केबिन में जा रहा हूं। मेरा कॉफी का कोई मूड नहीं है।" इतना कहकर वो सिद्धार्थ से पहले ही अव्यांश के केबिन से बाहर निकल गया।


    अब केबिन में सिर्फ अव्यांश, तन्वी और सारांश मौजूद थे। सारांश तन्वी से कहा "तन्वी! तुम तो कॉफी लेने जा रही थी ना? अपने बॉस को पिलाओ, मैं चलता हूं, मुझे बहुत काम है।" तन्वी ने अपना सर हिलाया और वहां से बाहर निकल गई। 


    तन्वी के जाते ही सारांश ने अव्यांश को कांधे से पकड़ा और उसे सोफे पर बैठा कर कहा "इस लड़की पर थोड़ा ध्यान रखना।"


   अव्यांश इस बात से बहुत बुरी तरह चौक गया। तन्वी एक सीधी-सादी लड़की थी जिसे सिर्फ अपने काम से मतलब था। उसको लेकर ऐसी बात! 'जरूर कुछ बड़ा कांड हुआ है वरना डैड कभी ऐसे किसी के बारे में नही बोलते।'


     अव्यांश ने पूछा "डैड! आप तन्वी के बारे में ऐसा क्यों बोल रहे है? सब ठीक तो है? मैं जब बैंगलोर में था तब आपने कहा था कि आप समर्थ भाई के बारे में कुछ बात करना है। तो आप क्या भाई की शादी के बारे में बात कर रहे थे? लेकिन ये बात तो आप फोन पर भी कर सकते थे। मुझे कुछ मामला समझ नही आ रहा। बताइए मुझे, क्या हुआ है?"


   सारांश ने अपने बेटे की तरफ देखा और सोचने लगा कि उसे इस बारे में बताना चाहिए या नहीं।




     तन्वी अव्यांश के केबिन से बाहर निकली और कॉफी मशीन की तरफ जाने लगी जो कि उसी फ्लोर पर एक कोने में था। उसके दिमाग में तो सिर्फ सारांश की कही बातें घूम रही थी। 'समर्थ सर की शादी? समर्थ सर ने इस रिश्ते के लिए हां कर दी है?' तन्वी की आंखों से आंसू छलकने को हुए।


     अपनी सोच में गुम वह बस चली जा रही थी। इतने में किसी ने उसका हाथ पकड़कर अंदर की तरफ खींचा और दरवाजा बंद कर दिया। तन्वी बुरी तरह घबरा गई, लेकिन इससे पहले कि वह चिल्ला पाती, समर्थ ने उसके मुंह पर हाथ रख उसे चुप करा दिया। वह दोनों इस वक्त बेहद करीब थे।


     तन्वी कुछ देर तक तो समर्थ को देखती रही, फिर अपनी सारी हिम्मत बटोर कर उसने समर्थ को धक्का दिया और खुद से दूर करते हुए कहा "ये आप क्या कर रहे हैं सर? अगर किसी ने यहां ऐसे हमें एक साथ देख लिया तो मेरी जॉब जा सकती है। वो जॉब जो कि आप की मेहरबानी से मिली है।"


     समर्थ अच्छे से जानता था कि तन्वी किस कदर गुस्सा है। ये नॉर्मल भी था। उसने तनवी के ताने को दिल पर नहीं लिया और ना ही उसे बुरा लगा। उसे तो बस अपनी सफाई देनी थी। उसने कहा "तनु.....!"


    तन्वी गुस्से में फट पड़ी "कितनी बार कहा है मैंने आपसे! मेरा नाम तन्वी है, तन्वी अरोड़ा! या तो आप मुझे तन्वी कह कर पुकार सकते है या फिर मिस अरोड़ा। जिस नाम से आप मुझे बुला रहे हैं, इस नाम से मुझे मेरे अपने बुलाते हैं। वो अपने जो मुझसे प्यार करते हैं। और इस नाम से मुझे बुलाने का हक आपको नहीं है।"


    तन्वी वहां से जाने को हुई लेकिन समर्थ ने एक बार फिर उसकी कलाई पकड़ी और अपने करीब खींचकर कहा "तनु! मेरी बात सुनो पहले। मेरी कोई शादी तय नहीं हुई है। चाचू बस मेरे लिए रिश्ता लेकर आए हैं और कुछ नहीं। ना ही मैंने उस लड़की को कभी देखा है और ना ही मैं उसे जानता हूं। तुम खुद सोचो, मैं ऐसे कैसे किसी भी लड़की से शादी के लिए हां कह सकता हूं?"


     तन्वी सुनी आंखों से समर्थ को देख रही थी। समर्थ समझ नहीं पाया कि आखिर तन्वी के मन में क्या चल रहा है। उसने फिर से अपनी सफाई देनी चाही, "तनु! प्लीज मेरा यकीन करो, मैं उस लड़की को नहीं जानता। और मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं इस रिश्ते से इनकार करने की।"


     तनु के होठों पर एक फीकी मुस्कान आई और उसने कहा "कम से कम उस लड़की का दिल मत दुखाना। हां या ना, को भी आपका फैसला हो, सीधे सीधे कह दीजिएगा। उसे कोई उम्मीद मत देना। क्योंकि जब यह उम्मीद टूटती है तो इंसान बुरी तरह बिखर जाता है। उसके पास जीने की वजह नहीं रहती। मैं नहीं चाहती कि जो हाल मेरा है, वही किसी और के साथ भी हो।"


     तन्वी ने एक बार फिर खुद को समर्थ की पकड़ से छुड़ाया और वहां से जाने लगी। समर्थ ने उसे पीछे से आवाज लगाया "तनु प्लीज......….!"


      तन्वी ने बिना समर्थ की तरफ देखे कहा, "तनु नही सर! तन्वी!! तन्वी नाम है मेरा। आपको अगर कोई काम नहीं है तो मैं चलती हूं। मेरे बॉस मेरा इंतजार कर रहे होंगे। आज उनका पहला दिन है और मेरा भी।" तनु वहां से फौरन निकल गई। समर्थ बेबसी से उसे जाते हुए देखता रह गया।



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