सुन मेरे हमसफर 216

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   रात के खाने के बाद निशि पानी का जग लेकर अपने मम्मी पापा के कमरे में आई और अपनी मम्मी से पूछा "मम्मी! आपको किसी और चीज की जरूरत तो नहीं है?"


   रेनू जी ने प्यार से अपनी बेटी के सर पर हाथ फेरा और बोली "बिल्कुल नहीं। जितना है वह बहुत है।"


     लेकिन एक बात मिश्रा जी को खटकी, जो वह काफी देर से पूछना चाह रहे थे लेकिन पूछ नहीं पा रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी से ही सवाल किया "निशी! अव्यांश कहां है? काफी टाइम से हम लोग यहां है लेकिन हमने उसे यहां इस घर में नहीं देखा।"


    निशी अब क्या ही बताती! इसलिए बहुत सोच समझ कर उसने आधा सच बताने का तय किया और बोली "पापा वह कुहू दी की शादी में उसकी भाग दौड़ कुछ ज्यादा ही हो रही है इसलिए वह दो दिन से कुहू दी के घर पर है। आप समझ सकते हैं।"


   रेनू जी बोली, "माना वो शादी की तैयारी में बिजी होगा लेकिन रात के इस वक्त.......! उसे अपना ख्याल रखना चाहिए। तूने फोन किया उसे?" निशी चुप रह गई।


     मिश्रा जी निशि की बात समझ रहे थे लेकिन इससे वह पूरी तरह कन्वेंस नहीं हो पा रहे थे। लेकिन अपनी बेटी से वह इससे ज्यादा कुछ पूछ नहीं सकते थे उन्होंने निशि का हाथ अपने हाथ में लिया और बोले "उसका ध्यान रखो। काम के चक्कर में वह खुद को भूल जाता है। तुम यहां हो इस बात से मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन तुम्हें उसके साथ होना चाहिए। देखो बेटा! हम चाहे किसी से कितना भी दूर हो वह मायने नहीं रखता, दिलों के बीच दूरियां नहीं आनी चाहिए। तुम दोनों के बीच क्या बात है, सब सही है या नहीं है ये हम नहीं जानते। लेकिन एक बात जो मैंने नोटिस की वह यह कि मैंने एक बार भी तुम दोनों को एक दूसरे से बात करते नहीं देखा। बहन की शादी है फिर भी उसके चेहरे पर जरा सी भी खुशी नहीं देखी। वह वाकई काम कर रहा है या फिर खुद को काम में व्यस्त कर रहा है, ये तुम्हें सोचना चाहिए। कोई तीसरा तुम दोनों के रिश्ते को संवार नहीं सकता, बिगाड़ जरुर सकता है। इसलिए ध्यान रखना।" 


    निशि चुपचाप अपने कमरे में चली आई। उसे लग रहा था जैसे उसके पिता ने उसके मन की बात पढ़ ली हो। लेकिन वह करे भी तो क्या! वो अव्यांश से बात करना चाहती थी लेकिन उसे खुद बहुत फील हो रहा था। अपने कमरे में आकर उसने सोने की कोशिश की लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। वह उठकर कमरे में टहलने लगी और टहलते हुए बालकनी की तरफ चली आई। वहां खड़े होकर ठंडी हवाओं को अपने चेहरे पर महसूस करते हुए वह बार-बार सिर्फ अव्यांश के बारे में ही सोच जा रही थी। सही गलत का फैसला करना उसके लिए मुश्किल हो रहा था।


    इतने में उसके फोन की घंटी बजी जो उसके हाथ में ही था। निशि ने नंबर देखा तो वह कोई अनजान नंबर था और अनजान नंबर देखकर निशी थोड़ी सहम गई। यह कॉल वह उठा या ना उठाएं वह सोचने लगी क्योंकि अनजान नंबर से फोन करने वाला उस अनजान शख्स ने काफी कुछ ऐसा बताया था जिसके बाद उसकी जिंदगी में उथल-पुथल मच गई थी।


    निशि उसे नंबर को रिसीव नहीं करना चाह रही थी। उसका फोन हाथ में बजते बजते शांत हो गया और निशी में राहत की सांस ली। लेकिन यह बस कुछ ही पलों का था। एक बार फिर उसका फोन बजने लगा। ना चाहते हुए भी उसने कांपते हाथों से उसे नंबर को रिसीव किया और फोन कान से लगाकर बोली "तुम चाहते क्या हो? कौन हो तुम और क्यों कर रहे हो तुम यह सब?"


    दूसरी तरफ से आवाज आई "क्या कह रही हो तुम निशी? मैं हूं!" वह आवाज सुनकर निशि एकदम से चौंक गई।




*****




    सारांश अव्यांश को मनाकर ऑफिस से ले तो आया था लेकिन फिलहाल वह घर आने के लिए तैयार नहीं था। इसलिए घर आने की बजाए वह सीधे कुहू के घर गया था। वहां खाना खाने के बाद सोने जाने को हुआ तब उसे कुछ ख्याल आया। ऑफिस से कुछ काम पेंडिंग थे और फाइल एक पेन ड्राइव में घर पर रखी हुई थी। घर जाने के नाम से अव्यांश थोड़ा हिचकीचा रहा था, फिर भी वह पैदल ही निकल पड़ा।


   मित्तल हाउस में सभी लगभग अपने कमरे में जा चुके थे। सारांश और सिद्धार्थ अभी हाल में ही बैठे कुछ डिस्कस कर रहे थे। अव्यांश को आया देख सिद्धार्थ ने उसे ताना मारा "तभी तो मैं सोचूं इसका मन कैसे लग रहा है वहां!"


    अव्यांश थोड़ा झेंप गया और मुस्कुरा कर बोला "कुछ नहीं बड़े पापा! मेरा कुछ जरूरी सामान था इसलिए मैं यहां आया था।"


   सिद्धार्थ उसके मजे लेने के फुल मूड में थे। वह बोले "सच में या फिर सिर्फ निशि से मिलने के लिए? हां मैं समझ सकता हूं, हम भी इस फेज से गुजर चुके हैं। तुझे बहाने बनाने की जरूरत नहीं है। जा, वह अभी अपने कमरे में ही है। बिल्कुल सही टाइम पर आया है तू, अभी-अभी अपने मम्मी पापा से फुर्सत मिली है उसे।"


    सारांश चुपचाप थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा। अव्यांश और निशी के बीच जो खटपट चल रही थी उसे बखूबी समझ रहे थे। अव्यांश चुपचाप अपने कमरे की तरफ पर चला गया।




     दूसरी तरफ निशि फोन कान से लगाए हुए थी। "देवेश तुम! देखो..... मैं समझ रही हूं तुम्हारी बात, तुम जो कुछ भी कहना चाह रहे हो। लेकिन प्लीज! यह मेरे और अव्यांश के बीच की बात है तुम इसमें ना पड़ो तो बेहतर होगा।"


      दूसरी तरफ से देवेश ने कहा "निशी! मैं आज भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं। प्लीज मेरे पास वापस आ जाओ। छोड़ दो उसे। वो तुम्हारे लायक नहीं है। तुम उसके धोके को कैसे भूल सकती हो? तुम तो उससे प्यार भी नहीं करती।"


   प्यार की बात सुनकर निशि थोड़ी असहज हो गई। उसने कहा "देवेश तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? यह सब मेरे लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। तुम समझ नहीं रहे, मम्मी पापा पता नहीं क्यों उसे इतना रेस्पेक्ट देते हैं, इतना कुछ होने के बाद भी। मुझे किसी की परवाह नहीं है, मैं बस यह सोच रही हूं कि मम्मी पापा को क्या बताऊंगी? मेरे और अव्यांश के डिवोर्स के बारे में सुनकर..........." 


     निशी को पीछे से कुछ गिरने की आवाज आई। उसकी बात अधूरी रह गई। उसने पलट कर देखा तो दरवाजे पर अव्यांश खड़ा उसे ही देख रहा था।


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